अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष : गांव से उठी आवाज़, बनी सैकड़ों महिलाओं की ताकत: चंद्रकुमारी लहरे की 13 साल की संघर्ष यात्रा
(पंकज कुर्रे)
जांजगीर चांपा। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के एक छोटे से गांव कोहका से निकलकर चंद्रकुमारी लहरे ने यह साबित किया है कि बदलाव की शुरुआत किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि एक मजबूत इरादे से होती है। पिछले लगभग 13 वर्षों से वह एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में समाज के उन लोगों की आवाज़ बनकर खड़ी हैं, जिनकी आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है।
एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली चंद्रकुमारी लहरे ने अपने जीवन को समाज के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को उठाया जिन पर अक्सर खुलकर बात नहीं की जाती—जैसे महिलाओं के साथ होने वाली असमानता, घरेलू हिंसा, गैर-बराबरी और सामाजिक भेदभाव। गांवों में जहां महिलाएं कई बार अपने अधिकारों के बारे में भी नहीं जानतीं, वहां चंद्रकुमारी ने उन्हें जागरूक करने और उनके साथ खड़े होने का साहसिक काम किया।
चंद्रकुमारी लहरे ने कई ऐसे मामलों में महिलाओं का साथ दिया, जहां वे अन्याय और अत्याचार का सामना कर रही थीं। उन्होंने पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए प्रशासन और समाज दोनों स्तरों पर आवाज़ उठाई। उनके प्रयासों से कई महिलाओं को न केवल न्याय मिला बल्कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए खड़े होने का आत्मविश्वास भी मिला।
महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में चंद्रकुमारी का काम सिर्फ संघर्ष तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने गांव-गांव में महिलाओं के साथ बैठकर संवाद किया, उन्हें उनके अधिकारों के बारे में बताया और जेंडर समानता की समझ विकसित की। उन्होंने महिलाओं को यह समझाया कि वे केवल घर और परिवार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी उनकी बराबर की भूमिका है।
चंद्रकुमारी लहरे ने जेंडर समानता और महिला सशक्तिकरण के विषय पर कई प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए। इन प्रशिक्षणों के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को उनके अधिकारों, नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास के बारे में जागरूक किया। उन्होंने सैकड़ों महिलाओं को संगठित किया और उन्हें नेतृत्व के लिए तैयार किया, ताकि वे अपने गांव और समाज में बदलाव की पहल कर सकें।
उनके प्रयासों से कई गांवों में महिला समूह मजबूत हुए हैं। आज इन समूहों की महिलाएं सामाजिक मुद्दों पर खुलकर बोल रही हैं, पंचायत और सामुदायिक बैठकों में भाग ले रही हैं और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही हैं। चंद्रकुमारी का मानना है कि जब महिलाएं संगठित होती हैं, तो समाज में सकारात्मक बदलाव की ताकत कई गुना बढ़ जाती है।
चंद्रकुमारी लहरे आज भी एक एनजीओ के माध्यम से गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करने का काम कर रही हैं। वे महिलाओं, बच्चों और समाज के कमजोर वर्गों के बीच जाकर उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, अधिकार और समानता जैसे मुद्दों पर जानकारी देती हैं। उनका उद्देश्य केवल समस्याओं को उठाना नहीं, बल्कि समाज में स्थायी बदलाव लाना है।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर चंद्रकुमारी लहरे जैसी महिलाएं हमें यह याद दिलाती हैं कि सशक्तिकरण केवल एक शब्द नहीं बल्कि एक सतत संघर्ष और प्रयास की प्रक्रिया है। उनकी कहानी यह दिखाती है कि अगर एक महिला ठान ले, तो वह न केवल अपने जीवन की दिशा बदल सकती है बल्कि पूरे समाज में जागरूकता और बदलाव की नई रोशनी जगा सकती है।
आज चंद्रकुमारी लहरे की पहचान केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी महिला नेता के रूप में है जिसने सैकड़ों महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की ताकत दी है। उनका सफर यह संदेश देता है कि बदलाव की शुरुआत हमेशा एक आवाज़ से होती है—और जब वह आवाज़ सच्चाई और साहस से भरी हो, तो वह पूरे समाज को बदलने की ताकत रखती है।
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