मूलभुत सुविधाओं से किया जा रहा वंचित, पानी-बिजली, पट्टा मांगने सरपंच-सचिव को भेजा नोटिस
(दीपक देवदास)
बालोद। जिले की गुरूर तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत आनंदपुर में आबादी भूमि के अधिकार को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। गांव के निवासी महेंद्र कुमार ने अधिवक्ता के जरिए ग्राम पंचायत के सरपंच तेजराम साहू और सचिव श्रीमती उमेश्वरी को कानूनी नोटिस जारी किया है। नोटिस में उन्होंने अपनी आबादी भूमि संबंधी अधिकार की पुष्टि कराते हुए बिजली, पानी और राशन कार्ड जैसी बुनियादी सुविधाओं को बहाल करने की मांग की है। वहीं वकील ने कहा कि मूलभुत सुविधाओं से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता। यह अपराध की श्रेणी में आता है।
महेन्द्र कुमार का कहना है कि वे ग्राम आनंदपुर के मूल निवासी हैं और उनका परिवार लंबे समय से यहां रह रहा है। वर्ष 2007 में तत्कालीन सरपंच श्रीमती तारणी बाई ने तहसीलदार गुरूर के समक्ष खसरा नंबर 132 और 137 की भूमि को आवासहीन परिवारों के लिए आबादी भूमि घोषित करने का प्रस्ताव दिया था। इस प्रस्ताव के साथ ग्राम पंचायत का रिजॉल्यूशन और आवासहीन व्यक्तियों की सूची भी संलग्न थी, जिसमें महेंद्र कुमार के दादा कार्तिक राम का नाम भी शामिल था। तहसीलदार और अनुविभागीय अधिकारी के प्रतिवेदन के आधार पर तत्कालीन कलेक्टर ने इस भूमि को आबादी भूमि घोषित करने का आदेश जारी किया था।
“ग्राम पंचायत से रसीद भी जारी की गई”
महेंद्र कुमार ने नोटिस में आरोप लगाया कि आदेश के बावजूद ग्राम पंचायत ने कोई उचित कार्रवाई नहीं की, जिसके कारण वे अपने अधिकारों से वंचित हैं। उनके मुताबिक आबादी पट्टा जारी करने के लिए ग्राम पंचायत में निर्धारित राशि भी जमा कर दी गई थी और इसकी रसीद भी उनके पास है। इससे पहले महेंद्र कुमार ने जनदर्शन में बिजली, पानी और राशन आदि सुविधाओं के लिए आवेदन दिया था, जिस पर कलेक्टर ने सुविधाएं उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया था।
“चर्चा कर समस्या का समाधान निकालेंगे”
सरपंच तेजराम साहू ने कहा कि महेंद्र कुमार को पट्टा नहीं दिया गया है। वे अपनी मर्जी से उस जमीन पर कब्जा कर झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं। पिछले कार्यकाल में लगभग तीन एकड़ भूमि को आबादी घोषित किया गया था, जिसमें ढाई एकड़ तालाब है। सरपंच ने बताया कि महेंद्र को दूसरी जगह जमीन देने की बात कह रहे हैं लेकिन वे मौजूदा जगह छोड़ने को तैयार नहीं हैं। सरपंच ने आगे कहा कि पंचायत भी चाहती है कि किसी को भी बिजली-पानी जैसी सुविधाओं से वंचित न रखा जाए। वे ग्राम विकास समिति और अन्य पंचायत प्रतिनिधियों से चर्चा कर समस्या का समाधान निकालेंगे।
“यह तो मानवाधिकार का सीधा हनन”
वकील चंद्रहास सिन्हा ने कहा कि मूलभूत सुविधा से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता। यह मानवाधिकार का सीधा हनन है। इस पर पंचायत प्रतिनिधियों पर अपराध दर्ज किया जा सकता है। बिजली, पानी, राशनकार्ड आदि सुविधा को कैसे रोका जा सकता है। इस भीषण गर्मी में कोई एक घंटा बिजली-पंखा के नहीं रह सकता। रात अधंरे में कोई काट नहीं सकता और उस गरीब परिवार को प्रताड़ित किया जा रहा है। नोटिस में मांग की गई है कि निर्धारित समय के भीतर पट्टा जारी कर बुनियादी सुविधाएं बहाल की जाएं, अन्यथा एफआईआर के साथ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
“क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का नियम”
बिजली और पानी को मूलभूत मानवाधिकार माना गया है। कानूनी रूप से किसी को इन सुविधाओं से वंचित करना गंभीर अपराध है। इसके लिए 6 महीने से 3 साल तक की जेल, 5 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकता हैं। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, यह जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का सीधा उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक यदि कोई जानबूझकर इन सेवाओं को बंद करता है तो पीड़ित व्यक्ति Ministry of Power के प्रावधानों के अनुसार कानूनी कार्रवाई कर सकता है।
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