“वन विभाग की लापरवाही से करोड़ों की हरियाली राख? आगजनी मामले में जवाबों पर उठे सवाल”
LRTI और सुशासन तिहार आवेदन के बाद खुली कक्ष क्रमांक 408 की आगजनी की परतें, नुकसान का आंकलन अब तक अधूरा
(मदन खाण्डेकर)
सारंगढ़-बिलाईगढ़। बिलाईगढ़ वनपरिक्षेत्र के कक्ष क्रमांक 408 में फरवरी 2026 में हुई भीषण आगजनी की घटना अब प्रशासनिक जवाबदेही और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी और बाद में सुशासन तिहार पोर्टल पर दर्ज शिकायत के जवाब में वन विभाग ने स्वीकार किया है कि 26 फरवरी 2026 को रोपण क्षेत्र में आग लगी थी, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया कि आग से वास्तव में कितने पौधे नष्ट हुए और शासन को कितनी आर्थिक क्षति हुई।
बिलाईगढ़ निवासी शैलेन्द्र कुमार देवांगन ने आवेदन देकर वनपरिक्षेत्र बिलाईगढ़ के कक्ष क्रमांक 408 में हुई आगजनी से नष्ट हुए पौधों, जांच प्रतिवेदन, जिम्मेदार अधिकारियों तथा नुकसान की राशि की जानकारी मांगी थी। आवेदन में विशेष रूप से हमारती प्रजाति, मिश्रित प्रजाति, छायादार एवं रिजनरेट पौधों के अलग-अलग आंकड़े मांगे गए थे।
वनमंडलाधिकारी कार्यालय द्वारा जारी जवाब में बताया गया कि आगजनी की घटना दर्ज की गई थी तथा वन अपराध प्रकरण क्रमांक 16384/14 दिनांक 26.02.2026 कायम किया गया। विभाग ने यह भी माना कि सूखी घास और सागौन वृक्षों के पत्तों के कारण आग तेजी से फैली। हालांकि सबसे महत्वपूर्ण सवाल—कितने पौधे जले और शासन को कितने करोड़ का नुकसान हुआ—उस पर विभाग ने स्पष्ट आंकड़े देने से हाथ खड़े कर दिए। जवाब में कहा गया कि “ग्रीष्म ऋतु में नुकसान का आंकलन संभव नहीं है और बाद में पुनः मूल्यांकन किया जाएगा।”
विशेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि 2019-20 में हुए वृक्षारोपण क्षेत्र में आग लगी है तो वन विभाग के पास रोपित पौधों का रिकॉर्ड, सर्वाइवल प्रतिशत और रखरखाव मद में खर्च की पूरी जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए। ऐसे में घटना के लगभग तीन माह बाद भी नुकसान का प्राथमिक आंकलन नहीं होना विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि परिसर रक्षक को निलंबित किया गया है। विभाग ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि निलंबन केवल आगजनी के कारण नहीं बल्कि “कर्तव्य से कई बार अनुपस्थित रहने” के कारण किया गया। इससे यह प्रश्न भी उठ रहा है कि यदि संबंधित कर्मचारी लगातार अनुपस्थित था तो उच्च अधिकारियों द्वारा समय रहते निगरानी और अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
वन संरक्षण से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस मामले में केवल निचले स्तर के कर्मचारी पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। यदि करोड़ों रुपये के रोपण क्षेत्र में आग लगी है तो इसकी जवाबदेही बीट गार्ड, परिसर रक्षक, परिक्षेत्र अधिकारी और निगरानी तंत्र तक तय होनी चाहिए। आग नियंत्रण के लिए फायर लाइन निर्माण, अग्नि प्रहरी व्यवस्था, गश्त और मॉनिटरिंग की स्थिति की भी स्वतंत्र जांच आवश्यक बताई जा रही है।
सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं कराना भी सवालों के घेरे में है। RTI कानून के अनुसार उपलब्ध अभिलेखों की प्रमाणित प्रतिलिपि देना विभाग की बाध्यता है। यदि जांच प्रतिवेदन, पौधों का रिकॉर्ड और खर्च विवरण उपलब्ध है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
वन एवं पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय वन अधिनियम 1927 तथा छत्तीसगढ़ वन विभागीय नियमों के तहत संरक्षित वन क्षेत्रों में आगजनी गंभीर अपराध की श्रेणी में आती है। यदि लापरवाही सिद्ध होती है तो विभागीय दंडात्मक कार्रवाई के साथ आर्थिक जवाबदेही भी तय की जा सकती है।
अब स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, वास्तविक नुकसान का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए तथा दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में वन संपदा को इस प्रकार की घटनाओं से बचाया जा सके।


