औद्योगिक क्षेत्र रसेड़ा–रसेडी में प्रदूषण का कहर, वर्षों से जर्जर मुख्यमार्ग बना आम नागरिकों के लिए अभिशाप
बलौदाबाजार। जिले का रसेड़ा–रसेडी क्षेत्र एक बड़े औद्योगिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति इस क्षेत्र में प्रवेश करता है, उसका स्वागत विकास से नहीं बल्कि भारी धूल, उड़ते कंकण और प्रदूषण के गुबार से होता है। लगभग एक किलोमीटर लंबे इस मुख्य मार्ग की हालत इतनी बदतर है कि यहां रहना आम नागरिकों के लिए किसी सजा से कम नहीं। दिनभर उड़ती धूल न केवल राहगीरों की आंखों और शरीर को गंदा कर रही है, बल्कि सड़क किनारे बसे घरों के भीतर तक धूल की मोटी परत जम चुकी है। रसोईघर से लेकर खाने-पीने के हर सामान पर धूल साफ नजर आती है। लोग मजबूरी में इस नरकीय जीवन को जीने को विवश हैं।
“हजारों बच्चों के स्वास्थ्य से हो रहा खिलवाड़”
इस मार्ग से प्रतिदिन हजारों लोगों का आवागमन होता है। जिले सहित आसपास के दर्जनों गांवों से बच्चे शिक्षा ग्रहण करने इसी मार्ग से आते-जाते हैं। माता-पिता बच्चों को साफ-सुथरे कपड़ों में स्कूल भेजते हैं, लेकिन जैसे ही वे इस धूल भरे इलाके में प्रवेश करते हैं, उनके कपड़े उसी दिन धोने लायक हो जाते हैं। धूल का बच्चों के स्वास्थ्य और भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा होगा, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।

“दशकों से नहीं हुआ सड़क का निर्माण”
स्थानीय लोगों का आरोप है कि दशकों से इस मार्ग पर लोक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा कोई ठोस कार्य नहीं किया गया। सैकड़ों शिकायतें और फाइलें विभाग के पास मौजूद हैं, लेकिन नतीजा शून्य है। चुनाव के समय नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं, सड़क निर्माण की घोषणाएं होती हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही सभी वादे धूल में मिल जाते हैं।
जिम्मेदार विभाग बने मूकदर्शक
यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। लोक निर्माण विभाग वर्षों से आंख मूंदे बैठा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी प्रतिवर्ष औद्योगिक इकाइयों से मापदंड तय करने आते हैं, लेकिन क्या उन्हें क्षेत्र में फैला प्रदूषण नजर नहीं आता? परिवहन विभाग भी ओवरलोड वाहनों पर लगाम लगाने में पूरी तरह विफल नजर आता है। सीमेंट कंपनियों के लिए कच्चा माल ढोने वाले सैकड़ों ओवरलोड वाहन दिन-रात इस जर्जर मार्ग से दौड़ रहे हैं, जिससे प्रदूषण कई गुना बढ़ चुका है।
“आम नागरिकों की पीड़ा, प्रशासन पर उठे सवाल”
लगातार भारी प्रदूषण के बीच जी रहे लोग न केवल अपने स्वास्थ्य से समझौता कर रहे हैं, बल्कि उनके बच्चों का भविष्य भी खतरे में है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो चार दिनों में सड़क निर्माण का कार्य तेज गति से शुरू किया जा सकता है, लेकिन कंपनी दबाव और ठेकेदारी के खेल में अधिकारी मौन साधे हुए हैं।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पीडब्ल्यूडी के अधिकारी जनता की चौखट तक पहुंचने से बचते नजर आते हैं। आम जनता का आरोप है कि रोटी–सुविधा की राजनीति में जनस्वास्थ्य को नजरअंदाज किया जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या रसड़ा–रसेड़ी के नागरिकों को स्वच्छ वातावरण और पक्की सड़क नसीब होगी, या वे यूं ही धूल में सांस लेते रहेंगे?









