पर्वःविसर्जन के दौरान गुंजे पारम्परिक गीत महिलाओ देर शाम तक घर घर किया भोजली वितरण
महानदी के त्रिवेणी संगम में विसर्जित हुई भोजली
मदन खाण्डेकर
गिधौरी। गिधौरी सहित अंचल के गांवों में बाजे गाजे एवं भजन किर्तन मंडली के साथ देर रात शनिवार को महानदी के त्रिवेणी संगम में भोजली विसर्जन किया गया ।
छत्तीसगढ़ का पारंपरिक और लोक प्रकृति से जुड़ा महापर्व ‘भोजली’ रक्षाबंधन के ठीक अगले दिन हर्षोल्लास के साथ संपन्न हो गया। इस अवसर पर ग्राम गिधौरी से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में महिलाओं और युवतियों में विशेष उत्साह देखने को मिला। पारंपरिक भोजली गीतों की गूंज और बाजे-गाजे के साथ माता भोजली को नम आंखों और मंगलकामनाओं के साथ नदी और तालाबों में विसर्जित किया गया।मुख्य आकर्षण और परंपराएंशोभायात्रा और गीत: विसर्जन से पहले महिलाओं ने अपने सिर पर भोजली की टोकरी रखकर पारंपरिक गीत ‘देवी गंगा लहर तुरंगा…’ गाए। नाचते-झूमते हुए श्रद्धालुगण स्थानीय नदी या तालाब के घाटों तक पहुंचे।फसल की कामना: सावन मास में बोए गए इन हरे-भरे पौधों भोजली की पूजा कर अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और गांव की रक्षा की प्रार्थना की गई।मितान और मित्रता की परंपरा: विसर्जन के बाद भोजली के पौधों को एक-दूसरे के कानों में खोंच कर और गले मिलकर लोगों ने अटूट मित्रता यानी ‘मितान’ या ‘सखी’ का रिश्ता मजबूत किया। बड़े-बुजुर्गों को भोजली देकर आशीर्वाद लिया गया और एक-दूसरे को प्रसाद बांटा गया।घर वापसी और पूजन: विसर्जन के बाद कुछ भोजली के हिस्सों को सुरक्षित वापस लाकर घर और मंदिर के देवी-देवताओं को अर्पित किया गया, ताकि सालभर घर में बरकत बनी रहे।यह पर्व छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति, आपसी भाईचारे और प्रकृति के प्रति प्रेम का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो आज भी उतनी ही तन्मयता के साथ निभाया जा रहा है।








