नकुल देव ढीढी सतनामी समाज व छत्तीसगढ़ के गौरव पुरुष थे -मोहन बंजारे

(मदन खाण्डेकर)

महासमुंद बोरिंग। जीवन परिचय*जन्म 12 अप्रैल 1914, ग्राम भोरिंग, जिला महासमुंद पिता*: अमरसिंह,माता श्रीमती कौशल्यादेवी निधन*: 16 अगस्त 1975, 61 वर्ष की आयु हुआ।


*उनके बड़े काम जो आज भी याद किए जाते हैं*1. *गुरु घासीदास जयंती की शुरुआत*

18 दिसंबर 1936 को अपने गांव भोरिंग में पहली बार गुरु घासीदास जी की जयंती मनाई। आज पूरे भारत में मनाई जाने वाली गुरु घासीदास जयंती की नींव उन्होंने रखी। 1970 में छत्तीसगढ़ में और 1972 में पूरे MP में 18 दिसंबर को अवकाश भी घोषित हुआ।


2. *पृथक छत्तीसगढ़ के लिए पहला सत्याग्रह*

1972 में अलग छत्तीसगढ़ राज्य के लिए आंदोलन शुरू किया, जिसके कारण वे जेल भी गए। उन्हें “छत्तीसगढ़ के लिए पहला सत्याग्रह करने वाले” के रूप में याद किया जाता है।3. *समाज सेवा और शिक्षा*

– 150 एकड़ जमीन समाज को दान कर दी

– महासमुंद में अपने संसाधन से बालकों के लिए छात्रावास चलाया

– शोषितों की रक्षा के लिए “समता सैनिक दल” का गठन किया4. *विचारधारा का प्रचार* छत्तीसगढ़ में अंबेडकरवादी और बौद्ध धम्म के विचार फैलाए। गुरु घासीदास के “मनखे-मनखे एक समान” के संदेश को घर-घर तक पहुंचाया।

*आज भी सम्मान*

हर साल उनकी जयंती पर बड़े नेता भोरिंग/तुमगांव में श्रद्धांजलि देने आते हैं। CM विष्णुदेव साय ने कहा था कि दादा नकुल देव ने निस्वार्थ भाव से समाज सेवा की और 150 एकड़ जमीन दान की – ऐसे लोग विरले होते हैं।

दादा नकुल देव ढीढी जी सिर्फ सतनामी समाज के ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के हर वंचित, शोषित वर्ग की आवाज थे।*दादा नकुल देव ढीढी जी के प्रमुख आंदोलन*

 

दादा जी को “माटी पुत्र” सिर्फ इसीलिए नहीं कहा जाता। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी शोषितों के हक और छत्तीसगढ़ की अस्मिता के लिए लड़ते हुए बिता दी।

 

*1. पृथक छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन – 1972*

ये सबसे बड़ा आंदोलन था।

– 1972 में उन्होंने साथियों के साथ मिलकर अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को लेकर पहला सत्याग्रह किया।

– उस समय MP का हिस्सा था छत्तीसगढ़, और यहां के विकास, भाषा, संस्कृति को लेकर उनकी चिंता थी।

– इस आंदोलन के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इसी वजह से उन्हें “छत्तीसगढ़ राज्य के लिए जेल जाने वाले पहले व्यक्ति” कहा जाता है।

 

*2. सामाजिक समानता और अत्याचार विरोध आंदोलन*

– *समता सैनिक दल का गठन*: जहां भी सतनामी समाज या दलितों पर अत्याचार होता, दादा जी अपने दल के साथ तुरंत पहुंच जाते थे और न्याय दिलाते थे।

– *मंदिर प्रवेश आंदोलन*: उन्होंने छत्तीसगढ़ में मंदिर प्रवेश के लिए भी आंदोलन चलाया।

– *शिक्षा का अधिकार*: बालक-बालिकाओं के लिए स्कूल और छात्रावास की मांग शासन से लगातार करते रहे। खुद महासमुंद में छात्रावास भी चलाया।

 

*3. गुरु घासीदास विचार प्रचार आंदोलन*

– 18 दिसंबर 1936 को भोरिंग में पहली बार गुरु घासीदास जयंती मनाकर शुरुआत की।

– गिरौदपुरी में 3 दिवसीय मेला लगवाया और जयंती पर अवकाश घोषित करवाया।

– “मनखे-मनखे एक समान” के सिद्धांत को पूरे छत्तीसगढ़ और भारत में फैलाया।

– बाद में बाबासाहेब अंबेडकर और गौतम बुद्ध के विचारों को भी छत्तीसगढ़ अंचल में फैलाने का काम किया।

 

*उनके आंदोलन की खासियत*

1. *अहिंसक और संगठनात्मक*: हर आंदोलन के पीछे संगठन था – चाहे समता सैनिक दल हो या जयंती समिति।

2. *जमीन से जुड़े*: 150 एकड़ जमीन दान कर दी ताकि समाज के काम आ सके।

3. *राजनीतिक भी, सामाजिक भी*: बाबासाहेब के मार्गदर्शन में राजनीति में हिस्सा लिया और क्षेत्र के मुद्दों पर चुनाव भी लड़े। उन्हें तत्कालीन सत्ताधीशों ने पद पैसा का प्रलोभन देकर खरीदने का प्रयास किया लेकिन दादा नकुल देव ढीढी जी कभी भी अपने स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं किया। समाज में राजनीतिक परिवर्तन एवं जागरूकता लाने अनेकों बार रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया से चुनाव लड़े। वे भले ही चुनाव नहीं जीत पाए लेकिन समाज ने दादा नकुल देव ढीढी जी को मंत्री की उपाधि देकर सम्मानित किए। तब से आज तक समाज में सम्मान के साथ उनको मंत्री दादा नकुल देव ढीढी जी को सम्मान के साथ लिया जाता है।

संक्षेप में कहें तो दादा नकुल देव ढीढी जी के आंदोलन 3 धुरी पर थे: धर्म-सुधार, सामाजिक न्याय, और छत्तीसगढ़ की अस्मिता।

गुरु घासीदास जयंती के जन्मदाता छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए प्रथम जेल यात्री छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास जी संदेश एवं “बाबा साहब अंबेडकर के शिक्षित बनो संगठित बनो “दादा नकुल देव ढीढी जी जीवन भर समाज सुधार की दिशा में काम करते रहे। छत्तीसगढ़ में अस्पृश्यता छुआ छूत को दूर करने गांव गांव जागरूकता अभियान चलाया। पुण्यतिथि महापरिनिर्वाण दिवस पर कोटि कोटि नमन विनम्र श्रद्धांजलि।

 

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